April 27, 2009

आईये, शिव के धनुष का स्वागत करें


मुझे पिनाक नामक भारतीय भाषाई कंप्यूटिंग को समर्पित संस्था की स्थापना की सूचना देते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है. सस्था के पंजीकरण का कार्य जारी है परंतु आज अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर उसकी साइट का शुभारम्भ किया जा रहा है. कृपया “पिनाक” का स्वागत करें।

मैं दो घटनाओं के बारे में बताना चाहूँगा. कुछ माह पहले भारतीय भाषाओं पर एक सम्मेलन हुआ था. हिन्दी की वकालत में बोल रहे वक्ता (नाम लेना अनिवार्य नहीं है) का स्लाइड-शो अंग्रेजी में था. उन्होने यह भी खेद जताया की फलाने-फलाने लेखक पर आज विकिपिडिया में कोई लेख नहीं है. जाहिर है इन सब के लिए सरकार को जिम्मेदार माना गया।

वर्डप्रेस का हिन्दीकरण, जिसको फटाफट निपटा देने का दावा भी किया था, अभियान से मैं भी बहुत जोश से जुड़ा था. मुझे खेद है कि वह काम आज भी लटका पड़ा है।

यह दो घटनाएँ ऐसी है जिन पर विचार करते करते एक ऐसी संस्था की परिकल्पना ने आकार लिया जो न केवल वेब-अनुप्रयोगों का हिन्दी व हमारी अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद करे साथ ही विकि जैसे ज्ञानकोशों को भी भरने का काम भी करे. इसके अलावा आम जनता को इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के उपयोग के संबंध में शिक्षा भी दे।

ऑपन-सोर्स भारतीयों के लिए वरदान साबित होंगे ऐसा मेरा मानना रहा है. ऐसे में इनके विकास पर भी ध्यान देने की जरूरत है. फिलहाल ये सभी कार्य स्वयं-सेवक स्तर पर हो रहे है और हिन्दी भाषी रोजी-रोटी के चक्कर में या फिर जानकारी के अभाव में अथवा तो उदासीनता के चलते ऐसे कामों से जुड़ नहीं पाते/चाहते है।

इसका हल हमें ऐसी संस्था के रूप में मिला जो इन सभी कार्यों के लिए स्वयं सेवकों व विशेषज्ञों की सेवा लेकर उन्हे यथा सम्भव भुगतान करेगी. इसके लिए धन, “जो दे सकते है ऐसे व्यक्तियों” को इनका महत्त्व समझा कर अर्जित किया जाएगा।

स्वयं सेवकों व विशेषज्ञों की सेवा लेने से वेब पर भारतीय भाषाओं के अनुप्रयोगों की उपलब्धता तीव्रता से बढ़ेगी और विकि जैसे ज्ञानकोश पर भी हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में जानकारी को तीव्रता से बढ़ा सकेंगे. हम सबका सपना भी तो यही है।

पिनाक एक पंजीकृत “सोसायटी” है (पंजीकरण की प्रक्रिया जारी है). कोई भी व्यक्ति जिसे इस अभियान के प्रति निष्ठा है इसका सदस्य बन सकता है. सदस्यता शुल्क “स्वैच्छिक” या फिर कहें तो सांकेतिक है. आप इसके बिना भी सदस्य बन सकते है. अन्य जानकारी के लिए पिनाक की साइट देखें।
जोगलिखी-संजय बेंगाणी के ब्‍लॉग से साभार।

December 8, 2008

एक वोट ने दिन में दिखा दिए तारे

यदि देश के किसी नेता को यह पूछा जाए कि उसे चुनाव में केवल एक वोट अधिक न मिले तो क्‍या होगा, शायद पहली नजर में वह इसे नजरअंदाज कर दें और कह भी दें कि एक वोट उसे न मिला तो भी चलेगा क्‍योंकि वह बड़े अंतर से जीत का माद्दा रखता है। लेकिन यही बात यदि राजस्‍थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सी पी जोशी से कोई पूछे कि एक वोट की कीमत क्‍या होती है। इस सवाल का जवाब जोशी से बेहतर शायद ही कोई नेता दे पाएगा जिसने उन्‍हें न केवल राज्य का मुख्‍यमंत्री बनने से अटका दिया बल्कि विधानसभा में बैठने से ही रोक दिया। राजसमंद जिले की नाथद्वारा सीट से जोशी चुनाव हार गए हैं। जोशी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शुमार थे। वे काफी दुर्भाग्यशाली रहे। वे केवल एक वोट से चुनाव हारे हैं। जोशी को भाजपा के कल्याण सिंह ने हराया। कल्याण को 62 हजार 216 वोट मिले। जबकि सी पी जोशी को 62 हजार 215 वोट ही मिल पाए। देश के सारे नेता इससे सबक लेंगे कि एक वोट ही उनको दिन में तारे दिखाने के लिए खूब है।

December 6, 2008

अच्‍युतानंदन मुख्‍यमंत्री न होते तो कुत्ता भी उन्‍हें नहीं जानता

केरल के मुख्‍यमंत्री वीएस अच्‍युतानंदन ने अनमना होकर मुंबई आतंकी हमलों में शहीद हुए मेजर संदीप उन्‍नीकृष्‍णन के घर के बारे में की गई टिप्‍पणी पर खेद तो प्रकट कर दिया। लेकिन देश के इस साक्षर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री से पहले तो ऐसे बयान और इसके बाद अनमना होकर माफी मांगना अच्‍छी बात नहीं कही जा सकती। अच्‍युतानंदन सत्ता के मदहोश में है और इसी वजह से वे ज्‍यादा ही बक गए। गौरतलब है कि मेजर संदीप के पिता द्वारा मिलने से इनकार करने के बाद अच्युतानंदन ने कहा था, ‘अगर वह (मेजर) संदीप का घर नहीं होता तो, वहां कुत्ता भी न जाता।’ अब इस पर यह कहा जा सकता है कि यदि अच्‍युतानंदन केरल के मुख्‍यमंत्री न होते तो उन्‍हें कुत्ता भी नहीं जानता। अच्‍युतानंदन, यह जनता है जिसने आप जैसे बिगड़लों को ऐसा कुत्ता बनाया है अपने वोट के माध्‍यम से जो घर का रहा न घाट का। समझ गए ना!

April 15, 2008

तिब्‍बतियों इस कमजोर दलाई लामा को हटाओं, यह तो चीन के साथ है


तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा ने धमकी दी है कि अगर तिब्बत में हिंसा नहीं थमी, तो वह निर्वासित सरकार के प्रमुख के पद से इस्तीफा दे देंगे। दलाई लामा ने कहा है कि अगर तिब्बत में हिंसा बेकाबू हुई तो मेरे पास इस्तीफा देने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं होगा। अगर तिब्बत के ज्यादातर लोग हिंसा चाहते हैं, तो वह अपना पद छोड़ देंगे।

दलाई लामा ने जिस निर्वासित सरकार के प्रमुख पद से इस्‍तीफा देने की बात कही है, वह कैसी सरकार है। यह सरकार चलती कहां हैं। यदि दलाई लामा में जरा भी स्‍वाभिमान और अपने देश के लिए मर मिटने का जज्‍बा होता तो वह आम तिब्‍बतियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे होते। वे इस समय आम तिब्‍बति के साथ नहीं है। उन्‍होंने खुद कह दिया है कि तिब्‍बतियों को चीन के साथ रहना चाहिए। अपने देश का जो गर्व होता है और जो स्‍वाभिमान होता है, वह दलाई लामा में नहीं है।

भारत में शरण लेकर उन्‍होंने दुनिया भर में अपने देश के लिए कोई ढंग से आंदोलन नहीं चलाया और हमेशा दो तरफा बातें करते रहें जिसमें बीच बीच में चीन का जबानी चेतावनी देना उनका खास हथियार रहा। जिस देश, राष्‍ट्र में जन्‍म लिया, बलिदान उसी पर हो जाए....ऐसी प्रेरणा उनके खून में नहीं रही। भाग आए भारत और टिक गए धर्मशाला में। अपने देश पर मर मिटना किसी के लिए भी सौभाग्‍य की बात हो सकती है। जो लोग आज तिब्‍बत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं उन्‍हें मैं सलाम करता हूं।

ओलम्पिक मशाल में हमारे फुटबाल खिलाड़ी बायचुंग भूटिया और पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने भाग न लेने का जो फैसला किया वह तारीफ के योग्‍य है। दलाई लामा को इन्‍हीं से कुछ सीख लेना चाहिए। दलाई लामा ने केवल दुनिया घूमने और जगह जगह अपना सम्‍मान कराने एवं पुरस्‍कार लेने के अलावा क्‍या किया। पुरस्‍कार पाने के पुतले बन गए हैं ये दलाई लामा। अपने देशवासियों को कह रहे हैं कि चीन के साथ चुपचाप रहो, अरे उससे आजाद कब कराओगे अपने देश को। यह कैसी वीरता कि चीन के आगे झुक गए दलाई लामा।

दलाई लामा जिसे लोग अपनी आंखों और सिर पर बैठा लेते हैं, साक्षात भगवान का रुप बताते हैं वह तो भगोड़े जैसा व्‍यवहार कर रहे हैं और चीन के साथ देश के विलय को मान चुके हैं। हे, तिब्‍बतवासियों खुद लड़ो अपनी लड़ाई और अपने देश को आजाद कराने की लड़ाई तब तक लड़ना जब तक एक भी तिब्‍बतवासी जिंदा है। छोड दो ऐसे दलाई लामा को। आज चीन ने तिब्‍बत को हड़प लिया और अब भारत के कुछ हिस्‍सों पर कब्‍जा करने की कोशिश करेगा। चीन को रोकना जरुरी है। जिस देश की नीयत में खोट हो वह हमारा भाई नहीं हो सकता। हिंदी चीनी भाई भाई नहीं।

February 29, 2008

आम बजट पहले ही लिक हो गया था

ओमप्रकाश तिवारी
जागरण से साभार


केंद्र सरकार द्वारा शुक्रवार को पेश किए जाने वाले बजट में विदर्भ के किसानों को क्या मिलने वाला है, शायद इसकी गंध राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेताओं को पहले ही लग गई है। महाराष्ट्र में यह अटकल बजट के तुरंत बाद राकांपा के किसान सम्मेलनों की फेहरिस्त देखकर लगाई जा रही है। बजट पेश होने के एक दिन बाद, यानी दो मार्च से ही राकांपा पूरे महाराष्ट्र में एक सप्ताह के अंदर छह किसान रैलियां करने जा रही है। इन रैलियों को कृतज्ञता रैली का नाम दिया गया है।

अर्थात विदर्भ सहित पूरे महाराष्ट्र के किसान बजट में कृषि क्षेत्र को मिली सुविधाओं के लिए मराठा क्षGप एवं केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के प्रति कृतज्ञता दर्शाने के लिए इन रैलियों में जमा होंगे गौरतलब है, पिछले चार वर्ष में विदर्भ के सिर्फ छह जिलों में पांच हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। बीते वर्ष भी आत्महत्या करनेवाले किसानों की संख्या 1200 से ज्यादा रही है। इसी को मुद्दा बनाकर विपक्षी दल शिवसेना और भाजपा की बड़ी-बड़ी रैलियां पिछले एक सप्ताह से पूरे महाराष्ट्र में हो रही हैं। अब दो मार्च को निर्धारित राकांपा की पहली रैली राज्य की उपराजधानी एवं विदर्भ के गढ़ नागपुर में होगी। अगली रैली तीन मार्च को विदर्भ के ही अकोला में होगी। तीसरी रैली चार मार्च को उत्तर महाराष्ट्र के जलगांव में, चौथी रैली पांच मार्च को पश्चिम महाराष्ट्र के कोल्हापुर में, पांचवी रैली मुंबई के पास ठाणे में सात मार्च को और अंतिम रैली आठ मार्च को मराठवाड़ा के बीड जिले में होगी।

इन सभी रैलियों के लिए झंडे बैनर अभी से रवाना कर दिए गए हैं। यही नहीं, बजट के दिन भी किसानों के लिए होने वाली घोषणाओं का स्वागत पटाखों और आतिशबाजियों से करने का निर्देश राकांपा कार्यकर्ताओं को दिया गया है ताकि किसानों को अहसास दिलाया जा सके कि ये सुविधाएं उन्हें राकांपा अध्यक्ष शरद पवार के कारण ही मिल रही हैं।